
एडॅस Topical Urdu Poetry On "AIDS"
एडॅस
है जहाँ मे एक मुसलसल इज़तेराब
एडॅस का किस तरह होग सददेबाब
है यह बीमारी अभी तक ला इलाज
खा रहे हैँ लोग जिस से पेचो ताब
आज कल जो लोग हैँ इस के शिकार
ज़िंदगी है उनकी गोया एक अज़ाब
अपनी ला इलमी से अबनाए वतन
कर रहे हैँ उन से पैहम इजतेनाब
दर हक़ीक़त है यह एक मोहलिक मरज़
जिस से हैँ ख़तरात लाहक़ बे हिसाब
जिसमोँ जाँ मेँ है तवाज़ुन लाज़मी
कीजिए ऐसा तरीक़ा इंतेख़ाब
हो न पैदा इन मेँ कोई एख़तेलाल
जो भी करना है हमेँ कर लेँ शेताब
होते ही कमज़ोर जिसमानी निज़ाम
रूह मेँ होता है पैदा इज़तेराब
सलब हो जाती है क़ुवत जिसम की
देने लगते हैँ सभी आज़ा जवाब
रफता रफता आता है ऐसा ज़वाल
जिसम खो देता है अपली आबो ताब
माहरीने तिब हैँ सरगरमे अमल
ता कि इसका कर सकेँ वह सददेबाब
जिस तरह टी बी थी पहले लाइलाज
आज है उस का तदारुक दसतयाब
इस का भी मिट जऐगा नामो निशाँ
एक न एक दिन तीरगी छट जाऐगी
दूर हो जाऐगा ज़ुलमत का सहाब
कीजिए हुसने अमल अहमद अली
है ज़रूरी एक ज़ेही इंक़ेलाब
है जहाँ मे एक मुसलसल इज़तेराब
एडॅस का किस तरह होग सददेबाब
है यह बीमारी अभी तक ला इलाज
खा रहे हैँ लोग जिस से पेचो ताब
आज कल जो लोग हैँ इस के शिकार
ज़िंदगी है उनकी गोया एक अज़ाब
अपनी ला इलमी से अबनाए वतन
कर रहे हैँ उन से पैहम इजतेनाब
दर हक़ीक़त है यह एक मोहलिक मरज़
जिस से हैँ ख़तरात लाहक़ बे हिसाब
जिसमोँ जाँ मेँ है तवाज़ुन लाज़मी
कीजिए ऐसा तरीक़ा इंतेख़ाब
हो न पैदा इन मेँ कोई एख़तेलाल
जो भी करना है हमेँ कर लेँ शेताब
होते ही कमज़ोर जिसमानी निज़ाम
रूह मेँ होता है पैदा इज़तेराब
सलब हो जाती है क़ुवत जिसम की
देने लगते हैँ सभी आज़ा जवाब
रफता रफता आता है ऐसा ज़वाल
जिसम खो देता है अपली आबो ताब
माहरीने तिब हैँ सरगरमे अमल
ता कि इसका कर सकेँ वह सददेबाब
जिस तरह टी बी थी पहले लाइलाज
आज है उस का तदारुक दसतयाब
इस का भी मिट जऐगा नामो निशाँ
एक न एक दिन तीरगी छट जाऐगी
दूर हो जाऐगा ज़ुलमत का सहाब
कीजिए हुसने अमल अहमद अली
है ज़रूरी एक ज़ेही इंक़ेलाब
डा.आर. के. पचौरी, चेयरमैन आई पी सी सी को नोबेल पुरसकार मिलने पर
डा.आर. के. पचौरी, चेयरमैन आई पी सी सी को नोबेल पुरसकार मिलने पर
राजेनदर. के. पचौरी का बहद अहम है काम
नोबेल इनाम सुलह का है आज जिनके नाम
है एक़तेज़ाए वक़त पलूशन की रोक थाम
अहले जहाँ को आज है उनका यही पयाम
तंज़ीम उनकी रखती है माहौल पर नज़र
ख़तरे मेँ आज जिस से है यह आलमी निज़ाम
अहले जहाँ मेँ आज मुसलसल है इज़तेराब
उनकी रिपोरट जब से हुई हर किसी पे आम
मसमूम आज आबो हवा है कुछ इस तरह
सब पी रहे हैँ ज़हरे हेलाकत का एक जाम
इंसान ख़ुद है अपनी हलाकत का जिममेदार
नौएबशर से लेती है फ़ितरत यह इंतेक़ाम
कोई है क़हत और कोई सैलाब का शिकार
चारोँ तरफ है आज मसाएब का इज़देहाम
है आज सब के पेशे नज़र अपना ही मोफ़ाद
करता नहीँ है कोई कयोटो का एहतेराम
ख़ुशहाल ज़िंगदी है जो अहमद अली अज़ीज़
करना पडे गा अपनी हिफ़ज़त का इंतेज़ाम
डा. अहमद अली बरक़ी आज़मी
598।9,ज़ाकिर नगर,नई देहली-110025
राजेनदर. के. पचौरी का बहद अहम है काम
नोबेल इनाम सुलह का है आज जिनके नाम
है एक़तेज़ाए वक़त पलूशन की रोक थाम
अहले जहाँ को आज है उनका यही पयाम
तंज़ीम उनकी रखती है माहौल पर नज़र
ख़तरे मेँ आज जिस से है यह आलमी निज़ाम
अहले जहाँ मेँ आज मुसलसल है इज़तेराब
उनकी रिपोरट जब से हुई हर किसी पे आम
मसमूम आज आबो हवा है कुछ इस तरह
सब पी रहे हैँ ज़हरे हेलाकत का एक जाम
इंसान ख़ुद है अपनी हलाकत का जिममेदार
नौएबशर से लेती है फ़ितरत यह इंतेक़ाम
कोई है क़हत और कोई सैलाब का शिकार
चारोँ तरफ है आज मसाएब का इज़देहाम
है आज सब के पेशे नज़र अपना ही मोफ़ाद
करता नहीँ है कोई कयोटो का एहतेराम
ख़ुशहाल ज़िंगदी है जो अहमद अली अज़ीज़
करना पडे गा अपनी हिफ़ज़त का इंतेज़ाम
डा. अहमद अली बरक़ी आज़मी
598।9,ज़ाकिर नगर,नई देहली-110025
होमी. जे.भाभा Remembering Homi. J. Bhabha
होमी. जे.भाभा
होमी भाभा नाज़िशे हिंदोसताँ
मुलक के भे नामवर साइंसदाँ
कियोँ न हो अहले वतन को उनपे नाज़
हमको बख़शा एक नक़शे जावदाँ
भे वह दुनियाँ भर मेँ अपने काम से
ऐटमी साइंस के रूहे रवाँ
अपने अफकारो अमल से भे सदा
मादरे हिंदोसताँ के पासबाँ
थे जो अपने काम से हर दिल अज़ीज़
हो गऐ रुख़सत वह हम से नागहाँ
उनके हैँ मरहूने मिननत अहले हिंद
जा बजा हैँ जिनकी अज़मत के निशाँ
उनकी इलमी ज़िनदगी का शाहकार
आज हर अहले नज़र पर है अयाँ
उनके ही नक़शे कदम पर आज तक
गामज़न है इलमो फ़न का कारवाँ
हो रहे हैँ लोग जिस से मुसतफीद
पहले था वह ख़ारिज अज़ वहमों गुमाँ
जिनके थे असलाफ फख़रे रोज़गार
गरदिशे दौराँ उनहैँ लाई कहाँ
पहले हम थे जिनके मंज़ूरे नज़र
ले रहे हैँ वह हमारा इमतेहाँ
उनका फ़ैज़ाने नज़र अहमद अली
इलम का है एक गंजे शायगाँ
होमी भाभा नाज़िशे हिंदोसताँ
मुलक के भे नामवर साइंसदाँ
कियोँ न हो अहले वतन को उनपे नाज़
हमको बख़शा एक नक़शे जावदाँ
भे वह दुनियाँ भर मेँ अपने काम से
ऐटमी साइंस के रूहे रवाँ
अपने अफकारो अमल से भे सदा
मादरे हिंदोसताँ के पासबाँ
थे जो अपने काम से हर दिल अज़ीज़
हो गऐ रुख़सत वह हम से नागहाँ
उनके हैँ मरहूने मिननत अहले हिंद
जा बजा हैँ जिनकी अज़मत के निशाँ
उनकी इलमी ज़िनदगी का शाहकार
आज हर अहले नज़र पर है अयाँ
उनके ही नक़शे कदम पर आज तक
गामज़न है इलमो फ़न का कारवाँ
हो रहे हैँ लोग जिस से मुसतफीद
पहले था वह ख़ारिज अज़ वहमों गुमाँ
जिनके थे असलाफ फख़रे रोज़गार
गरदिशे दौराँ उनहैँ लाई कहाँ
पहले हम थे जिनके मंज़ूरे नज़र
ले रहे हैँ वह हमारा इमतेहाँ
उनका फ़ैज़ाने नज़र अहमद अली
इलम का है एक गंजे शायगाँ
सुनिता विलियम
सुनिता विलियम
सुनिता विलियम के ख़लाई तजरबे का मरहलह
और फिर नासा से उसकाएक मुसलसल राबतह
असरे हाज़िर में है यह साईंस का औजे कमाल
मुददतों करते रहैंगे लोग जिसका तज़करह
कुछ भी नामुमकिन नहीं है हो अगर अज़मे सफर
दरसे इबरत है हमारे वासते यह वाक़ेयह
जिन में है ज़ौके तजससुस और असरी आगही
उनका है शामो सहर तहकी़क फितरी मशग़लह
नौ दिसमंबर को रवानह वह हुई सूऐ फ़लक
लायक़े तहसीं है यह अज़मे सफर यह हौसलह
थी फ़ज़ा में नौ महीने तक वह सरगरमे अमल
कारनामह उसका यह है आज तक बेसाबक़ह
एक ज़ररीं बाब है तारीख़ का तेईस जून
कामयाबी से हुआ तकमील जब यह मरहलह
होंगे फितरत के बहुत से राज़ हम पर मुनकशिफ
अहले दानिश जब करेंगे इसका इलमी तजज़ियह
आ गया अटलांटिस ले कर ख़लाबाजोँ को साथ
अब मिले गा उनको उनकी कामयाबी का सिलह
अहदे हाज़िर मेँ है अब साइँस बेहद सूद मंद
आइऐ मिल जुल के हम भी यह करें अब फैसलह
हम भी अपनाँऐँगे इस को अहले मग़रिब की तरह
रुक नहीँ सकता कभी तहक़ीक़ का यह सिलसिलह
अहले मशरिक़ इलमोँ दाँनिश मेँ किसी से कम नहीँ
कमयाबी से किया सुनिता ने तै यह मरहलहदर हक़ीक़त है यह बरक़ी एक मिशन तारीख़साज़
सुनिता विलियम का सफर साँइंस का है मोजज़ह
डा. अहमद अली बरक़ी आज़मी, ज़ाकिर नगर, नई दिलली- 110025
सुनिता विलियम के ख़लाई तजरबे का मरहलह
और फिर नासा से उसकाएक मुसलसल राबतह
असरे हाज़िर में है यह साईंस का औजे कमाल
मुददतों करते रहैंगे लोग जिसका तज़करह
कुछ भी नामुमकिन नहीं है हो अगर अज़मे सफर
दरसे इबरत है हमारे वासते यह वाक़ेयह
जिन में है ज़ौके तजससुस और असरी आगही
उनका है शामो सहर तहकी़क फितरी मशग़लह
नौ दिसमंबर को रवानह वह हुई सूऐ फ़लक
लायक़े तहसीं है यह अज़मे सफर यह हौसलह
थी फ़ज़ा में नौ महीने तक वह सरगरमे अमल
कारनामह उसका यह है आज तक बेसाबक़ह
एक ज़ररीं बाब है तारीख़ का तेईस जून
कामयाबी से हुआ तकमील जब यह मरहलह
होंगे फितरत के बहुत से राज़ हम पर मुनकशिफ
अहले दानिश जब करेंगे इसका इलमी तजज़ियह
आ गया अटलांटिस ले कर ख़लाबाजोँ को साथ
अब मिले गा उनको उनकी कामयाबी का सिलह
अहदे हाज़िर मेँ है अब साइँस बेहद सूद मंद
आइऐ मिल जुल के हम भी यह करें अब फैसलह
हम भी अपनाँऐँगे इस को अहले मग़रिब की तरह
रुक नहीँ सकता कभी तहक़ीक़ का यह सिलसिलह
अहले मशरिक़ इलमोँ दाँनिश मेँ किसी से कम नहीँ
कमयाबी से किया सुनिता ने तै यह मरहलहदर हक़ीक़त है यह बरक़ी एक मिशन तारीख़साज़
सुनिता विलियम का सफर साँइंस का है मोजज़ह
डा. अहमद अली बरक़ी आज़मी, ज़ाकिर नगर, नई दिलली- 110025
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ڈاکٹر احمد علی برقیؔ اعظمی
- ڈاکٹر احمد علی برقیؔ اعظمی اعظم گڑھ کے ایک ادبی خانوادے سے تعلق رکھتے ہیں۔ آپ کے والد ماجد جناب رحمت الہی برقؔ دبستان داغ دہلوی سے وابستہ تھے اور ایک باکمال استاد شاعر تھے۔ برقیؔ اعظمی ان دنوں آل آنڈیا ریڈیو میں شعبہ فارسی کے عہدے سے سبکدوش ہونے کے بعد اب بھی عارضی طور سے اسی شعبے سے وابستہ ہیں۔۔ فی البدیہہ اور موضوعاتی شاعری میں آپ کو ملکہ حاصل ہے۔ آپ کی خاص دل چسپیاں جدید سائنس اور ٹکنالوجی خصوصاً اردو کی ویب سائٹس میں ہے۔ اردو و فارسی میں یکساں قدرت رکھتے ہیں۔ روحِ سخن آپ کا پہلا مجموعہ کلام ہے۔
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