Poetic Compliments To Noor On His Thought

Noor Ke Ashaar Hain Barqi Hadees E Dilbari
Kaif O Sarmasti se Hai Sarshar Unki Shairi
Hai "JAWAANI"Wardat E Ishq Ki Manzar Kashi
Is Ke Har Har Sher Mein Hai Fikr O Fan ki Tazgi
Mahfil E "RAAH E ADAB" Mein Aaj Hain Wah Surkhru
Hai Ayaan Ghazlon Se Unki Soz O Saaz E Zindagi
Koi Mane Ya Na Mane Hai Mujhe Iska Yaqeen
Dar Haqeeqat "NOOR" Hain Bazm E Adab Ki Roshani
"Zindagi Har Haal Mein Qudrat Ka Ek Inaam Hai"
Jazbah E Mehr O Wafa BARQI Hai Husn E Zindagi

With best Compliments From Ahmad Ali Barqi Azmi To Noor.


Dr.Ahmad Ali Barqi Azmi
598/9, Zakir Nagar, jamia Nagar
New Delhi-110025

My INTRODUCTION

My INTRODUCTION
DR. AHMAD ALI BARQI AZMI
NEW DELHI-110025

Shahar E Azamgarh Hai Barqi Mera Aabaaee Watan
Jiski Azmat Ke Nishan Hain Har Taraf Jalwa Fegan
Mere Walid The Wahan Par Marja E Ahl E Nazar
Jinke Fikr O Fan Ka Majmuaa Hai “Tanveer E Sukhan”
Naam Tha Rahmat Ilahi Aur Takhallus Barq Tha
Zaufegan Thi Jinke Dam Se Mahfil E Sher O Sukhan
Aaj Main Jo Kuchh Hoon Wah Hai Unka Faizan E Nazar
Unse Virse Main Mila Mujhko Shaoor E Fikr O Fan
Raajdhani Dehli Main Hoon Ek Arse Se Muqeem
Kar Raha Hoon Main Yahaan Par Khidmat E Ahl E Watan
Radio Ki Farsi Service Se Main Hoon Munsalik
Mera Asri Aagahi Barqi Hai Mauzoo E Sukhan

As a mark of respect to Late Manohar Sharma "Saghar" Palampuri


Dwijender Dwij


میرا تعارف

میرا تعارف
شھر اعظم گڈہ ھے برقی میرا آبائی وطن
جس کی عظمت کے نشاں ھیں ھرطرف جلوہ فگن
میرے والد تھے وھاں پرمرجع اھل نظر
جن کے فکرو فن کامجموعہ ھے تنویر سخن
نام تھا رحمت الھی اور تخلص برق تھا
ضوفگن تھی جن کے دم سے محفل شعروسخن
آج میں جو کچھ ھوں وہ ھے ان کا فیضان نظر
ان کے ورثے میں ملا مجھکو شعور فکروفن
راجدھانی دھلی میں ھوں ایک عرصے سے مقیم
کر رھا ھوں میں یھاں پر خدمت اھل وطن
ریڈ یو کے فارسی شعبے سے ھوں میں منسلک
میرا عصری آگھی برقی ھے موضوع سخن
ڈاکٹر احمد علی برقی اعظمی
ذاکر نگر، نئی دھلی

मेरा तआरुफ

मेरा तआरुफ
शहरे आज़मगढ है बर्क़ी मेरा आबाई वतन
जिसकी अज़मत के निशाँ हैँ हर तरफ जलवा फेगन
मेरे वालिद थे वहाँ पर मर्जए अहले नज़र
जिनके फिकरो फ़न का मजमूआ है तनवीरे सुख़न
नाम था रहमत इलाही और तख़ल्लुस बर्क़ था
ज़ौफ़ेगन थी जिनके दम से महफ़िले शेरो सुख़न
आज मैँ जो कुछ हूँ वह है उनका फ़ैज़ाने नज़र
उन विरसे मेँ मिला मुझको शऊरे फिकरो फ़न
राजधानी देहली मेँ हूँ एक अर्से से मुक़ीम
कर रहा हूँ मैँ यहाँ पर ख़िदमते अहले वतन
रेडियो के फ़ारसी एकाँश से हूँ मुंसलिक
मेरा असरी आगही बर्क़ी है मौज़ूए सुख़न

डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी
ज़ाकिर नगर, नई दिल्ली

2- ग़ज़ल

2- ग़ज़ल
डा. अहमद अली बर्की़ आज़मी

सता लेँ हमको दिलचसपी जो है उनको सताने मेँ
हमारा क्या वह हो जाएँगे रुस्वा ख़ुद ज़माने मेँ
लडाएगी मेरी तदबीर अब तक़दीर से पंजा
नतीजा चाहे जो कुछ हो मुक़ददर आज़माने मेँ
जिसे भी देखिए है गर्दिशे हालात से नालाँ
सुकूने दिल नहीँ हासिल किसी को इस ज़माने मेँ
वह गुलचीँ हो कि बिजुली सबकी आखोँ मेँ खटकते हैँ
यही दो चार तिनके जो हैँ मेरे आशयाने मेँ
है कुछ लोगोँ की ख़सलत नौए इंसाँ की दिलआज़ारी
मज़ा मिलता है उनको दूसरोँ का दिल दुखाने मेँ
अजब दसतूरे दुनियाए मोहब्बत है अरे तौबा
कोई रोने मेँ है मश़ग़ूल कोई मुसकुराने मेँ
पतिंगोँ को जला कर शमए महफिल सबको ऐ बर्क़ी
दिखाने के लिए मसरूफ है आँसू बहाने मेँ

ग़ज़ल

1- ग़ज़ल
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी

नहीँ है उसको मेरे रंजो ग़म का अंदाज़ा
बिखर न जाए मेरी ज़िंदगी का शीराज़ा
अमीरे शहर बनाया था जिस सितमगर को
उसी ने बंद किया मेरे घर का दरवाज़ा
सितम शआरी में उसका नहीँ कोई हमसर
सितम शआरोँ मेँ वह है बुलंद आवाज़ा
गुज़र रही है जो मुझपर किसी को क्या मालूम
जो ज़ख्म उसने दिए थे हैँ आज तक ताज़ा
गुरेज़ करते हैँ सब उसकी मेज़बानी से
भुगत रहा है वह अपने किए का ख़मयाज़ा
है तंग क़फिया इस बहर मेँ ग़ज़ल के लिए
दिखाता वरना मैँ ज़ोरे क़लम का अंदाज़ा
वह सुर्ख़रू नज़र आता है इस लिए बर्क़ी
है उसके चेहरे का ख़ूने जिगर मेरा ग़ाज़ा

अमीरे शहर-हाकिम, सितम शआरी-ज़ुल्म
सितम शआर- ज़लिम, ग़ाज़ा-क्रीम,बुलंद आवाज़ा- मशहूर

غزل2

غزل

जिस तरफ देखो प्रदूषण का उधर फैला है जाल

जिस तरफ देखो प्रदूषण का उधर फैला है जाल
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी
वास्तव मेँ है ग्लोबल वीर्मिंग का यह कमाल
अहले अमरीका जिसने कर दिया जीना मुहाल
है कहीँ कटरीना और रीटा कहीँ ज़ेरे सवाल
है यह फितरत का इशारा हर कमाले रा ज़वाल
अब भी कुछ बिगडा नही है होँ अगर सब हमख़्याल
मिल के कर सकते हैँ मोन्टर्याल कन्वेंशन बहाल
सब परीशाँहाल हैँ हो जल्द इसका ख़ातमा
जिस तरफ देखो प्रदूषण का उधर फैला है जाल
हो रहे हैँ लोग अमराज़े तनफ़्फुस के शिकार
पुर मुसर्रत ज़िंदगी है आजकल ख़्वाबो श़याल
मसलहत अंदेश हैँ अहले सियासत आज कल
कोई करता ही नहीँ नौए बशर की देख भाल
कह रहा है यह ज़बाने हाल से भोपाल आज
हम पे जो गुज़री है हम ही जानते हैँ उसका हाल
आज कल हालात से लेता नहीँ कोई सबक़
जिस से ख़तरे मेँ है हर दम हर किसी की जानोमाल
वक़्त का है यह तक़ाजा़ हो कयोटो पर अमल
होँ सभी इसके लिए बर्की हमेशा हम ख़्याल

फितरत- प्रकृति, हर कमाले रा ज़वाल-हर उत्थान का पतन, अमराज़े तनफ़्फुस- दमा, नौए बशर- इंसान