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غزل سرائی :ڈاکٹراحمدعلی برقی اعظمی

غزل سرائی :ڈاکٹراحمدعلی برقی اعظمی

Ghazal Recitation By Dr.Ahmad Ali Barqi Azmi

Dr.Ahmad Ali Barqi Azmi Recitting His Ghazal

غزل:امن وصلح وآشتی کی ھے بہت دشوار راہ



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حسین ابن علی کی پھرزمانے کو ضرورت ھے

आनंदम् का एक वर्ष पूरे - 12वीं काव्य गोष्ठी

आनंदम् का एक वर्ष पूरे - 12वीं काव्य गोष्ठी

हर महीने के दूसरे रविवार को आयोजित होने वाली आनंदम् की 12वीं काव्य गोष्ठी पश्चिम विहार में जगदीश रावतानी आनंदम् के निवास स्थान पर 12 जुलाई, 2009 को जनाब ज़र्फ़ देहलवी की अध्यक्षता में संपन्न हुई। कहना न होगा कि इसके साथ ही आनंदम् की गोष्ठियों के सिलसिले को शुरू हुए एक साल भी पूरा हो गया। इस गोष्ठी की ख़ास बात ये रही कि कुछ शायर जो कुछ अपरिहार्य कारणों से नहीं आ पाए उन्होंने वीडियो टेली कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए इस गोष्ठी में शिरकत की जिसमें जनाब अहमद अली बर्क़ी आज़मी और पी के स्वामी जी भी शामिल थे।

हमेशा की तरह गोष्टी के पहले सत्र में “क्या कविता / ग़ज़ल हाशिए पर है?” विषय पर चर्चा की गई जिसमें ज़र्फ़ देहलवी, मुनव्वर सरहदी, शैलेश कुमार व जगदीश रावतानी ने अपने-अपने विचार रखे। निष्कर्ष रूप में ये बात सामने आई कि चूंकि पहले की बनिस्पत अब मलटीमीडिया की मौजूदगी से काव्य गोष्टियों, सम्मेलनो व मुशायरों में श्रोताओं की कमी दिखाई देती है पर कविता कहने व लिखने वालों व गम्भीर किस्म के श्रोताओं में इज़ाफ़ा ही हुआ है। इंटर नेट ने कवियों को अंतर-राष्ट्रीय ख्याति दिला दी है।

दूसरे सत्र के अंतर्गत गोष्ठी में पढ़ी गई कुछ रचनाओं की बानगी देखें –


अहमद अली बर्क़ी आज़मी-
कौन है, किसका यह पैग़ाम है, क्या अर्ज़ करूँ
ज़िन्दगी नामा-ए- गुमनाम है, क्या अर्ज़ करूँ
कल मुझे दूर से जो देख के करते थे सलाम
पूछते हैं तेरा क्या नाम है, क्या अर्ज़ करूँ

दर्द देहलवी-
कहते हैं नेकियों का ज़माना तो है नहीं
दामन भी नेकियों से बचना तो है नहीं।
हर कोई गुनगुनाए ग़ज़ल मेरी किसलिए
इक़बाल का ये तराना तो है नहीं।

शैलेश कुमार सक्सैना-
आज फिर वह उदास है, जिसका दिमाग़ दिल के पास है
जो मिला रहे हैं दूध में ज़हर, उन्हीं के हाथ में दारू का गिलास है।



जगदीश रावतानी आनंदम् के साथ मनमोहन शर्मा तालिब

मनमोहन शर्मा तालिब-
गुरबत को हिकारत की निगाहों से न देखो
हर शख्स न अच्छा है न दुनिया में बुरा है।
सभी प्यार करते हैं एक दूसरे से
मुहब्बत माँ की ज़माने से जुदा है।

क़ैसर अज़ीज़-
जाने किस हिकमत से ऐसी कर बैठे तदबीरें लोग
ले आए मैदाने अमल में काग़ज़ की शमशीरें लोग।
रंज ख़ुशी में मिलना जुलना होता है जो मतलब से
अपनी दया की खो देंगे इक दिन सब तासीरें लोग।


जगदीश रावतानी आनंदम् के साथ भूपेन्द्र कुमार

भूपेन्द्र कुमार –
बासी रोटी की क़ीमत तो तुम उससे पूछो यारो
जिसको ख़ाली जेबें लेकर साँझ ढले घर आना है।
तूफानों से क्रीड़ा करना है अपना शौक़ पुराना
भागे सारी दुनिया ग़म से अपना तो याराना है।

जगदीश रावतानी आनंदम्-
सुलझ जाएगी ये उलझन भी इक दिन
तेरी जुल्फों का पेचो ख़म नहीं है।
अमन है चैन है दुनिया में जगदीश
फटे गर बम तो भी मातम नहीं है।

पी.के. स्वामी-
दोस्तों को देख कर दुश्मन सदा देने लगे
जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे।
कुछ सिला मुझको वफाओं का मेरी पाने तो दो
ज़हर के बदने मुझे तुम क्यों दवा देने लगे।

मुनव्वर सरहदी-
मुझे आदाबे मयख़ाना को ठुकराना नहीं आता
वो मयकश हूँ जिसे पी कर बहक जाना नहीं आता।
दिले पुर नूर से तारीकियाँ मिटती हैं आलम की
मुनव्वर हूँ मुझे ज़ुल्मत से घबराना नहीं आता।


जगदीश रावतानी आनंदम् के साथ ज़र्फ़ देहलवी

ज़र्फ देहलवी-
गाँव की मिट्टी, शहर की ख़ुशबू, दोनों से मायूस हुए
वक़्त के बदले तेवर हमको, दोनों में महसूस हुए।

खेल खिलंदड़, मिलना-जुलना, अब न रहे वो मन के मीत
भूल गईं ढोलक की थापें, बिसर गए सावन के गीत
चिड़ियों की चहकन सब भूले, भूले झरनों का संगीत
तरकश ताने प्रचुर हुए सब, मृदुता में कंजूस हुए।

अंत में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में जनाब ज़र्फ़ देहलवी ने आनंदम् के एक साल पूरा होने पर बधाई दी और नए कवियों को जोड़ने व कविता को आधुनिक तकनीक के ज़रिए एक नए मुकाम तक पहुँचाने के लिए प्रशंसा की और सबके प्रति धन्यवाद प्रकट किया।

Dr.Ahmad Ali Barqi Azmi Using Internet

Video Of 2 Ghazals Of Dr.Ahmad Ali Barqi Azmi Recited At Ghalib Academy,New Delhi

जगदीश रावतानी - ९वि आनंदम काव्य घोष्टि-Ahmad Ali Barqi Azmi With Jagdish Rawtani Reciting Ghazal






आनंदम काव्य गोष्टी १२ तारीख को जगदीश रावतानी के निवास स्थान पर संपन हुई । इसमे शरीक कविगणों के नाम है : अनुराधा शर्मा , संजीव कुमार , सक्षर्था भसीन , मुनवर सरहदी, दरवेश भरती, मनमोहन तालिब, ज़र्फ़ देहलवी, डॉ विजय कुमार, शिलेंदर सक्सेना , प्रेम सहजवाला शहदत्त अली निजामी, दर्द देहलवी, मजाज़ साहिब, नूर्लें कौसर कासमी , रमेश सिद्धार्थ , अख्तर आज़मी, अहमद अली बर्की, दिक्सित बकौरी, डॉ शिव कुमार, अनिल मीत , इंकलाबी जी और जगदीश रावतानी। घोषति की अध्येक्ष्ता दरवेश भरती जी ने की । सचालन जगदीश रावतानी ने किया।




एक सार्थक बहस भी की गयी जिसका विषय था "साहित्य की दशा और दिशा " जिसमे डॉ रमेश सिद्धार्थ , डॉ विजय कुमार, कुमारी अनुराधा शर्मा और डॉ दरवेश भारती ने अपने विचार रखे।




काव्य घोश्ती की शुरुआत से पहले ये दुखद सुचना दी गयी के जाने माने साहित्येकर विष्णु प्रभाकर जी का देहांत हो गया है । एक और दुखद समाचार यह था के श्री बलदेव वंशी जी के जवान पुत्र का भी हाल ही मैं देहांत हो गया .
दो मिनट का मौन धारण कर के उनकी आत्माओं की शान्ति और परिवार के सद्सियो को सदमा बर्दाशत करने की हिमत के लिए प्रार्थना की गयी ।




काव्य घोस्टी मैं पढ़े गए कुछ कवियों के कुछ शेर/ पंक्तिया प्रस्तुत है ।








डॉ अहमद अली बर्की :




वह मैं हु जिसने की उसकी हमेशा नाज़बर्दारी
मगर मैं जब रूठा मानाने तक नही पंहुचा
लगा दी जिसकी खातिर मैंने अपनी जान की बाज़ी
वह मेरी कबर पर आंसू बहाने तक नही पंहुचा
अख्तर आज़मी :
ख़ुद गरज दुनिया है इसमे बाहुनर हो जाइए
आप अपने आप से ख़ुद बाखबर हो जाइये
जिसका साया दूसरो के द्वार के आंगन को मिले
ज़िन्दगी की धुप मैं ऐसा शजर हो जाइये
डॉ विजय कुमार
प्यासी थी ये nazaraN tera दीदार हो गया
नज़रो मैं बस गया तू और तुझसे प्यार हो गया
डॉ दरवेश भारती :
इतनी कड़वी ज़बान न रखो
डोर रिश्तो की टूट जायेगी






जगदीश रावतानी :




जहा जहा मैं गया इक जहा नज़र आया
हरेक शे मैं मुझे इक गुमा नज़र आया
जब आशियाना मेरा खाक हो गया जलकर
पड़ोसियों को मरे तब धुँआ नज़र आया


मुनवर सरहदी :
ज़िन्दगी गुज़री है यु तो अपनी फर्जानो के साथ
रूह को राहत मगर मिलती है दीवानों के साथ ]


घोश्ती का समापन दरवेश भरती जी के व्याख्यान और उनकी एक रचना के साथ हुआ । जगदीश रावतानी ने सबका धन्यवाद किया .







आनंदम काव्य गोष्टी १२ तारीख को जगदीश रावतानी के निवास स्थान पर संपन हुई । इसमे शरीक कविगणों के नाम है : अनुराधा शर्मा , संजीव कुमार , सक्षर्था भसीन , मुनवर सरहदी, दरवेश भरती, मनमोहन तालिब, ज़र्फ़ देहलवी, डॉ विजय कुमार, शिलेंदर सक्सेना , प्रेम सहजवाला शहदत्त अली निजामी, दर्द देहलवी, मजाज़ साहिब, नूर्लें कौसर कासमी , रमेश सिद्धार्थ , अख्तर आज़मी, अहमद अली बर्की, दिक्सित बकौरी, डॉ शिव कुमार, अनिल मीत , इंकलाबी जी और जगदीश रावतानी। घोषति की अध्येक्ष्ता दरवेश भरती जी ने की । सचालन जगदीश रावतानी ने किया।


एक सार्थक बहस भी की गयी जिसका विषय था "साहित्य की दशा और दिशा " जिसमे डॉ रमेश सिद्धार्थ , डॉ विजय कुमार, कुमारी अनुराधा शर्मा और डॉ दरवेश भारती ने अपने विचार रखे।


काव्य घोश्ती की शुरुआत से पहले ये दुखद सुचना दी गयी के जाने माने साहित्येकर विष्णु प्रभाकर जी का देहांत हो गया है । एक और दुखद समाचार यह था के श्री बलदेव वंशी जी के जवान पुत्र का भी हाल ही मैं देहांत हो गया .
दो मिनट का मौन धारण कर के उनकी आत्माओं की शान्ति और परिवार के सद्सियो को सदमा बर्दाशत करने की हिमत के लिए प्रार्थना की गयी ।


काव्य घोस्टी मैं पढ़े गए कुछ कवियों के कुछ शेर/ पंक्तिया प्रस्तुत है ।




डॉ अहमद अली बर्की :


वह मैं हु जिसने की उसकी हमेशा नाज़बर्दारी
मगर मैं जब रूठा मानाने तक नही पंहुचा
लगा दी जिसकी खातिर मैंने अपनी जान की बाज़ी
वह मेरी कबर पर आंसू बहाने तक नही पंहुचा
अख्तर आज़मी :
ख़ुद गरज दुनिया है इसमे बाहुनर हो जाइए
आप अपने आप से ख़ुद बाखबर हो जाइये
जिसका साया दूसरो के द्वार के आंगन को मिले
ज़िन्दगी की धुप मैं ऐसा शजर हो जाइये
डॉ विजय कुमार
प्यासी थी ये nazaraN tera दीदार हो गया
नज़रो मैं बस गया तू और तुझसे प्यार हो गया
डॉ दरवेश भारती :
इतनी कड़वी ज़बान न रखो
डोर रिश्तो की टूट जायेगी


जगदीश रावतानी :


जहा जहा मैं गया इक जहा नज़र आया
हरेक शे मैं मुझे इक गुमा नज़र आया
जब आशियाना मेरा खाक हो गया जलकर
पड़ोसियों को मरे तब धुँआ नज़र आया

मुनवर सरहदी :
ज़िन्दगी गुज़री है यु तो अपनी फर्जानो के साथ
रूह को राहत मगर मिलती है दीवानों के साथ ]

घोश्ती का समापन दरवेश भरती जी के व्याख्यान और उनकी एक रचना के साथ हुआ । जगदीश रावतानी ने सबका धन्यवाद किया .

Poetic Compliment To MANUU


یوم مادر:Mother’s Day



یوم مادر:Mother’s Day
Dr.Ahmad Ali Barqi Azmi

Yaum e maader sabhi manaate hain
Maan ki azmat ke geet gaate hain

Maan hai jinke wajood ki zaamin
Maan ko aksar woh bhool jaate hain

Maan ki mamta jahaan mein hai anmol
Muft mein jisko sab ganwaate hain

Maan ne ki jinki naaz bardaari
Naaz biwi ke woh uthaate hain

Ghar ki sheerazah bandi maan se hai
Maan na ho to yeh toot jaate hain

Unhein maaloom hai ki maan kyaa hai
Maan se jo log choot jaate hain

Maan ka jab bhi khayaal aata hai
Sote sote woh jaag jaate hain

Yeh khayaalaat hain bahut dilsoz
Neend raaton ki jo udaate hain

Maan ka woh qaul yaad hai mujh ko
Wadah karte hain jo nibhaate hain

Maan thee jab tak mujhe khayaal na thaa
Ab mujhe din woh yaad aate hain

Maan ka ne’amul badal naheen Barqi
Is liye jashn yeh manaate hain

GHAZAL : Qalb Hai Mera Ishq Se Sarshaar




GHAZAL : Qalb Hai Mera Ishq Se Sarshaar

DR.AHMAD ALI BARQI AZMI

Qalb hai mera ishq se sarshaar
Kis tarah iska main karoon izhaar

Kuchch bhi sunne ko jo na ho tayyar
Us se hai arz e mudd’aa bekaar

Jabhi iqraar hai kabhi inkaar
Uske tarz e amal se hoon bazaar

Kab tak aakhir sahoon main uske waar
Mujh se nahaq hai bar sare paikaar

Samne aaye to sahi mere
Gul khiaye gi baahami takraar

Aana hota agar to aa jaata
Sirf karta hai wadah e deedaar

Samne aaya nagahaan ek din
Kya bataa’oon main apna haal e zaar

Dekh kar usko ho gaya bekhud
Jab huein us se meri aankhein chaar

Neend aankhon se ho gaii kaafoor
Main hoon uske feraaq mein bedaar

Naqsh hain lauh e qalb par mere
Rukh e zeba ke uske naqsh o negaar

Khanah e dil mein ab naheen hai woh
Le gaya saath mera sabr o qaraar

Gham gusaari ka dam jo bharta thaa
Mera BARQI naheen hai woh ghamkhwaar