Monday, April 19, 2010

तरही ग़जल :कौन चला बनवास रे जोगी

तरही ग़जल
कौन चला बनवास रे जोगी
डा.अहमद अली बर्क़ी आज़मी

प्रीत न आई रास रे जोगी
ले लूँ क्या बनवास रे जोगी

दर-दर यूँ ही भटक रहा हूँ
आता नहीँ क्यों पास रे जोगी

रहूँ मैं कब तक भूखा प्यासा
आ के बुझा जा प्यास रे जोगी

देगा कब तू आख़िर दर्शन
मन है बहुत उदास रे जोगी

कितना बेहिस है तू आख़िर
तुझे नहीं एहसास रेजोगी

मन को चंचल कर देती है
अब भी मिलन की प्यास रे जोगी

छोड़ के तेरा जाऊँ कहाँ दर
मैं तो हूँ तेरा दास रे जोगी

देख ले मुड़कर ज़रा इधर भी
कौन चला बनवास रे जोगी

सब्र की हो गई हद ‘बर्क़ी’ की
तेरा हो सत्यानास रे जोगी

4 comments:

Suman said...

nice

girish pankaj said...

aapkee ghazal parh kar aanand aa gayaa . itanaa aanand ki maine bhi 20 sher kah daale. mujhe prerit karane ke liye aabhar. aapke har sher pyaare hai. badhai. ek-do din baad mere sher bhi zaroor dekh len kal shaayad post karoonga.

Shekhar Kumawat said...

bahut khub


shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/

Rajendra Swarnkar said...

डा.अहमद अली बर्क़ी आज़मी साहब,
नमस्कार !
आज की ग़ज़ल पर यही तरही "कौन चला बनवास रे जोगी" अभी जारी है , जबकि आपने यहां 18-19 अप्रैल को ही यह पोस्ट लगा रखी है, तो यह मूल मिसरा आपका है या राहत इन्दौरी जी का ?

इतना विलंब से इस ग़ज़ल पर बात करना शायद उतना महत्व न रखे… लेकिन बहुत उम्दा लिखा है आपने ।
आज की ग़ज़ल पर शायद तमाम विवादों सहित आपकी नज़रों से मेरी अधूरी ग़ज़ल भी पढ़ने में आई हो । प्लीज़ मेरे ब्लॉग पर आकर पूरी ग़ज़ल देखें , और सुनें ।

बड़ी मेहरबानी , इस comment का मेल द्वारा मुझे जवाब ज़रूर देने की कृपा करें । और मेरे ब्लॉग "शस्वरं" पर तशरीफ़ ला'कर मेरी ग़ज़ल और उसकी मेरे द्वारा अदायगी पर अपनी बेशक़ीमती राय ज़रूर दे'कर हौसलाअफ़्ज़ाई करें।
आपकी मेल / टिप्पणी का मुझे बहुत बेसब्री से इंतज़ार है ।
- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं