Sunday, August 10, 2008

GHAZAL By DR.AHMAD ALI BARQI AZMI

1 comment:

नीरज गोस्वामी said...

हुजुर अगर देवनागरी या फ़िर रोमन लिपि में भी अगर आप इसे शय करते तो ये बंद भी उसे पढ़ कर वाह..वा...कर लेता..हम जैसे ग़ज़ल प्रेमियों के साथ जो उर्दू नहीं पढ़ सकते...ये बहुत ना इंसाफी है आपकी.
नीरज