Saturday, November 22, 2008

ग़ज़ल :डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी





ग़ज़ल
डा. अहमद अली बर्क़ी आज़मी

जिस परी पैकर से मुझको प्यार है
वह मुसलसल दरपए आज़ार है

ख़ानए दील मेँ मकीँ है वह मेरे
फिर न जाने कैसी यह दीवार है

कर दिया है जिस ने दोनोँ को जुदा
जिस से रबते बाहमी दुशवार है

है ख़ेज़ाँ दीदह बहारे जाँफेज़ा
दूर जब से मूझसे मेरा यार है

उसके इस तर्ज़े तग़ाफ़ुल के सबब
ज़ेहन पर हर वक्त मेरे बार है

उसका तरज़े कार तो ऐसा न था
पहले था एक़रार अब इंकार है

क्या बताए अपनी बर्क़ी सरगुज़श्त
हाले दिल नाक़ाबिले इज़हार है

2 comments:

"अर्श" said...

ख़ानए दील मेँ मकीँ है वह मेरे
फिर न जाने कैसी यह दीवार है

बहोत खूब शे'र कही आपने बहोत उम्दा ..

मैं आपने ब्लॉग पे आपको आमंत्रित करना चाहता हूँ ,आपका मेरे ब्लॉग पे बहोत स्वागत है .......

नीरज गोस्वामी said...

ख़ानए दील मेँ मकीँ है वह मेरे
फिर न जाने कैसी यह दीवार है
भाई..वाह...सुभान अल्लाह...क्या शेर है...मुबारक हो इस कामयाब ग़ज़ल के लिए...हाँ इसमें लफ्ज़ थोड़े मुश्किल जरूर हैं...
नीरज