Thursday, July 10, 2008

2- ग़ज़ल

2- ग़ज़ल
डा. अहमद अली बर्की़ आज़मी

सता लेँ हमको दिलचसपी जो है उनको सताने मेँ
हमारा क्या वह हो जाएँगे रुस्वा ख़ुद ज़माने मेँ
लडाएगी मेरी तदबीर अब तक़दीर से पंजा
नतीजा चाहे जो कुछ हो मुक़ददर आज़माने मेँ
जिसे भी देखिए है गर्दिशे हालात से नालाँ
सुकूने दिल नहीँ हासिल किसी को इस ज़माने मेँ
वह गुलचीँ हो कि बिजुली सबकी आखोँ मेँ खटकते हैँ
यही दो चार तिनके जो हैँ मेरे आशयाने मेँ
है कुछ लोगोँ की ख़सलत नौए इंसाँ की दिलआज़ारी
मज़ा मिलता है उनको दूसरोँ का दिल दुखाने मेँ
अजब दसतूरे दुनियाए मोहब्बत है अरे तौबा
कोई रोने मेँ है मश़ग़ूल कोई मुसकुराने मेँ
पतिंगोँ को जला कर शमए महफिल सबको ऐ बर्क़ी
दिखाने के लिए मसरूफ है आँसू बहाने मेँ

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